अमेरिका के वीजा नियमों पर बोले मार्को रुबियो, कहा- भारत निशाने पर नहीं
नई दिल्ली/वॉशिंगटन। अमेरिका में नौकरी करने की इच्छा रखने वाले भारतीय पेशेवरों और वहां काम कर रही भारतीय आईटी कंपनियों के बीच वीजा नियमों को लेकर चिंता बनी हुई है। इसी बीच अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने स्पष्ट किया है कि ट्रंप प्रशासन के आव्रजन संबंधी बदलाव भारत के खिलाफ नहीं हैं। उनका कहना है कि अमेरिका अपनी व्यवस्था में सुधार करते हुए अपने कर्मचारियों और राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देना चाहता है।
रुबियो के मुताबिक, ये बदलाव किसी एक देश को ध्यान में रखकर नहीं किए गए हैं, बल्कि अमेरिकी सरकार का उद्देश्य वीजा कार्यक्रमों के कथित दुरुपयोग को रोकना और नियमों का पालन सुनिश्चित करना है।
अमेरिका वीजा नियमों में बदलाव क्यों कर रहा है?
रुबियो ने अमेरिकी आव्रजन व्यवस्था में लंबे समय से चली आ रही खामियों का हवाला दिया। उनका कहना है कि कुछ कार्यक्रमों का गलत इस्तेमाल हुआ है और सरकार अब इन कमियों को दूर करने की कोशिश कर रही है।
अमेरिकी प्रशासन का तर्क है कि विदेशी कर्मचारियों को नियुक्त करने की प्रक्रिया में नियमों का पालन होना चाहिए और अमेरिकी कामगारों के हितों की रक्षा की जानी चाहिए। रुबियो ने यह भी कहा कि जिन देशों के नागरिक बड़ी संख्या में अमेरिकी वीजा कार्यक्रमों का इस्तेमाल करते हैं, वहां इन बदलावों का प्रभाव अधिक दिखाई दे सकता है।
भारतीय आईटी कंपनियों पर भी पड़ा असर
अमेरिका के श्रम विभाग ने 9 अक्टूबर को स्थायी श्रम प्रमाणन कार्यक्रम यानी PERM से कई बड़ी आईटी कंपनियों को निलंबित किया था। इनमें भारतीय कंपनियों इन्फोसिस, टाटा, विप्रो, एचसीएल और कॉग्निजेंट के साथ फ्रांस की कैपजेमिनी भी शामिल बताई गई हैं। अमेरिकी कंपनियों माइक्रोसॉफ्ट और एडोबी के नाम भी इस कार्रवाई में सामने आए।
अमेरिकी विभाग के अनुसार, संबंधित कंपनियों के खिलाफ संघीय जांच चल रही हैं। PERM प्रक्रिया अमेरिका में कुछ विदेशी कर्मचारियों के रोजगार-आधारित स्थायी निवास यानी ग्रीन कार्ड की प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।
हालांकि, PERM कार्यक्रम से निलंबन और H-1B वीजा पर रोक अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं। इसलिए इस कार्रवाई का अर्थ सभी संबंधित कर्मचारियों के मौजूदा वीजा स्वतः रद्द होना नहीं है।
H-1B वीजा भारतीय पेशेवरों के लिए क्यों महत्वपूर्ण है?
H-1B वीजा अमेरिकी कंपनियों को विशेष कौशल वाली नौकरियों के लिए विदेशी पेशेवर नियुक्त करने की अनुमति देता है। भारतीय आईटी विशेषज्ञ और तकनीकी कर्मचारी लंबे समय से इस श्रेणी का उपयोग करते रहे हैं।
नियमों में सख्ती, आवेदनों की अतिरिक्त जांच या रोजगार संबंधी प्रक्रियाओं में बदलाव से कर्मचारियों और कंपनियों के लिए अनिश्चितता बढ़ सकती है। इसका असर नौकरी बदलने, अमेरिका में काम शुरू करने और दीर्घकालीन रोजगार योजना बनाने पर भी पड़ सकता है।
रुबियो ने जोर देकर कहा कि अमेरिका विदेशी नागरिकों के आने, पढ़ने, काम करने और निवेश करने के खिलाफ नहीं है। उनका कहना है कि इन गतिविधियों को निर्धारित कानूनों और प्रक्रियाओं के तहत होना चाहिए।

विदेशी छात्रों के OPT कार्यक्रम पर भी प्रस्ताव
अमेरिकी सरकार ने विदेशी विद्यार्थियों के लिए ऑप्शनल प्रैक्टिकल ट्रेनिंग (OPT) कार्यक्रम को लेकर भी नई फीस लगाने का प्रस्ताव रखा है। OPT के तहत पात्र F-1 छात्र अपनी पढ़ाई से संबंधित क्षेत्र में व्यावहारिक काम का अनुभव हासिल कर सकते हैं।
प्रस्तावित फीस की राशि की जानकारी संबंधित रिपोर्ट में स्पष्ट नहीं की गई है। इसलिए इसे लागू हो चुका नियम मानने के बजाय प्रस्ताव के रूप में देखना चाहिए। यदि इस तरह के बदलाव लागू होते हैं, तो अमेरिका में पढ़ाई कर रहे भारतीय विद्यार्थियों की लागत और नौकरी की योजना प्रभावित हो सकती है।
भारत और अमेरिका के हितों को लेकर अलग-अलग दृष्टिकोण
भारत का रुख है कि कुशल पेशेवरों की अंतरराष्ट्रीय आवाजाही से दोनों देशों को फायदा होता है। भारतीय विशेषज्ञ अमेरिकी कंपनियों को तकनीकी कौशल उपलब्ध कराते हैं, जबकि उन्हें वैश्विक अनुभव और करियर के अवसर मिलते हैं।
दूसरी ओर, ट्रंप प्रशासन अमेरिकी कर्मचारियों को प्राथमिकता देने और आव्रजन नियमों के सख्त पालन पर जोर दे रहा है। यही अंतर वीजा नीति को लेकर दोनों देशों के बीच चर्चा का अहम विषय बना हुआ है।
भारतीय आवेदकों को क्या ध्यान रखना चाहिए?
अमेरिका में नौकरी करने या वीजा आवेदन की तैयारी कर रहे भारतीयों के लिए जरूरी है कि वे अपने वीजा की श्रेणी, आवेदन की स्थिति और अमेरिकी अधिकारियों के ताजा निर्देशों की जांच करें। किसी प्रस्ताव, किसी कंपनी पर हुई कार्रवाई और किसी व्यक्ति के वीजा की स्थिति को एक जैसा नहीं समझना चाहिए।
रुबियो के बयान से यह संकेत मिलता है कि अमेरिकी प्रशासन अपने आव्रजन कार्यक्रमों में बदलाव जारी रखना चाहता है। हालांकि, भारतीय पेशेवरों पर वास्तविक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि कौन-से नियम लागू होते हैं और वे किस वीजा या रोजगार प्रक्रिया के अंतर्गत आते हैं।