Day 1 – Maa Shailputri
नवरात्रि के पावन पर्व के प्रथम दिन आज पूरा देश श्रद्धा और उल्लास के साथ मां शैलपुत्री की उपासना कर रहा है。 हिमालय की पुत्री होने के कारण इन्हें ‘शैलपुत्री‘ कहा जाता है, जो हमारे जीवन में अचल स्थिरता और अडिग दृढ़ संकल्प का प्रतीक हैं। उनके एक हाथ में त्रिशूल और दूसरे में कमल का फूल है, और उनका वाहन वृषभ (बैल) है, जो सात्विकता और शक्ति का संतुलन दिखाता है。
खगोलीय परिदृश्य (Astronomical View) और ज्योतिषीय महत्त्व
नवरात्रि का यह समय केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं है, बल्कि यह एक महान प्राकृतिक और खगोलीय संक्रांति (Astronomical Transition) का काल है। इस समय शरद ऋतु के आगमन के साथ सूर्य कन्या राशि में गोचर करते हैं और पृथ्वी की धुरी में बदलाव के कारण ब्रह्मांडीय ऊर्जा का प्रवाह तीव्र हो जाता है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, मां शैलपुत्री चंद्र ग्रह (Moon) को नियंत्रित करती हैं। आज के दिन उनकी साधना करने से कुंडली में चंद्र दोष शांत होता है, मन की चंचलता दूर होती है और भावनाओं पर सकारात्मक नियंत्रण स्थापित होता है।
तिथि एवं समयावधि (Time Duration & Muhurat)
इस वर्ष आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि का मान 11 अक्टूबर 2026 (रविवार) को पूरे दिन रहेगा। पंचांग के अनुसार प्रतिपदा तिथि 10 अक्टूबर की रात 09:19 बजे से शुरू होकर 11 अक्टूबर की रात 09:30 बजे तक व्याप्त रहेगी।
- घटस्थापना (कलश स्थापना) मुख्य मुहूर्त: सुबह 06:19 बजे से सुबह 10:12 बजे तक。
- अभिजित मुहूर्त (सर्वश्रेष्ठ समय): दोपहर 11:44 बजे से दोपहर 12:31 बजे तक रहेगा, जिसमें की गई पूजा अनंत फलदायी मानी जाती है।
अध्यात्मिक दृष्टिकोण से, मां शैलपुत्री का सीधा संबंध हमारे शरीर के मूलाधार चक्र से है। यह चक्र मानव जीवन का आधार है, जो हमें पृथ्वी तत्व से जोड़ता है। आज के इस आपाधापी और मानसिक तनाव से भरे दौर में, जब इंसान का मन लगातार विचलित रहता है, मां शैलपुत्री की पूजा हमें आंतरिक मजबूती देती है। जैसे हिमालय अपनी जगह से हिल नहीं सकता, वैसे ही मां की कृपा से भक्त के भीतर संकटों से लड़ने का साहस और स्थिरता आती है।
एक समाज के रूप में भी, आज हमें उसी दृढ़ संकल्प की आवश्यकता है जो मां शैलपुत्री के स्वरूप से प्रेरित है। चाहे वह हमारे व्यक्तिगत लक्ष्य हों या राष्ट्र निर्माण का संकल्प, आधार मजबूत होना अनिवार्य है। आइए, शारदीय नवरात्रि के इस पावन अवसर पर हम अपने भीतर की चेतना को जगाएं, अपने आधार को शुद्ध करें और मां शैलपुत्री से प्रार्थना करें कि वे हमें जीवन के हर उतार-चढ़ाव में अडिग रहने की शक्ति प्रदान करें।
सभी पाठकों को नवरात्रि के प्रथम दिन की हार्दिक शुभकामनाएं!
मां शैलपुत्री की सरल पूजा विधि
- पवित्रता और संकल्प: प्रात:काल जल्दी उठकर स्नान आदि से निवृत्त होकर स्वच्छ (संभव हो तो पीले या सफेद) वस्त्र धारण करें और पूजा स्थल को गंगाजल छिड़क कर शुद्ध कर लें।
- घटस्थापना: लकड़ी की चौकी पर लाल कपड़ा बिछाकर मां दुर्गा और मां शैलपुत्री की तस्वीर स्थापित करें। सबसे पहले अपनी परंपरा के अनुसार जौ बोएं और कलश (घट) की स्थापना करें।
- पूजन अर्पण: माता को कुमकुम, अक्षत, सिंदूर, और सफेद फूल (चमेली या कनेर) अत्यंत प्रिय हैं, वे अर्पित करें। धूप और घी का दीपक प्रज्वलित करें।
- विशेष भोग: मां शैलपुत्री को प्रसन्न करने के लिए गाय के शुद्ध देसी घी का भोग लगाएं। माना जाता है कि इससे रोगी को निरोगी काया और सुख-समृद्धि मिलती है।
- मंत्र जाप व आरती: माता के सिद्ध मंत्रों का श्रद्धापूर्वक कम से कम 108 बार जाप करें, दुर्गा चालीसा का पाठ करें और अंत में घी के दीपक से कपूर मिलाकर माता की आरती उतारें।
मां शैलपुत्री के सिद्ध मंत्र
- ध्यान श्लोक (दुर्गा सप्तशती):वन्दे वाञ्छितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम्।
वृषारूढां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्॥ - सरल नाम मंत्र:ॐ देवी शैलपुत्र्यै नमः॥
- स्तुति मंत्र:या देवी सर्वभूतेषु माँ शैलपुत्री रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
