"A poignant and thoughtful portrait of veteran actor Nana Patekar, showcasing his intense gaze and expressive persona."nana-patekar-tribute-obituary-2026

मुंबई: भारतीय सिनेमा जगत ने अपने एक सबसे मौलिक और सशक्त स्तंभ को हमेशा के लिए खो दिया है। अपने बेजोड़ अभिनय, अनूठी संवाद अदायगी और बेबाक शख्सियत से दशकों तक दर्शकों के दिलों पर अमिट छाप छोड़ने वाले महान अभिनेता और निर्देशक नाना पाटेकर अब हमारे बीच नहीं रहे। प्राप्त जानकारी के अनुसार, गोवा स्थित उनके आवास पर दिल का दौरा (कार्डियक अरेस्ट) पड़ने के बाद उन्हें गंभीर हालत में अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। वह 75 वर्ष के थे।

उनके परिवार, विशेषकर उनके बेटे मल्हार पाटेकर द्वारा इस दुखद खबर की पुष्टि किए जाने के बाद से ही देश भर के कला प्रेमियों और फिल्म जगत में शोक की लहर दौड़ गई है। उनके पार्थिव शरीर को उनके पैतृक और ग्रामीण ठिकानों पर अंतिम दर्शन के लिए लाए जाने की तैयारियां चल रही हैं, जहां राजकीय सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार संपन्न होगा।

अभिनय के फलक पर एक अमिट हस्ताक्षर

पाँच दशकों से अधिक लंबे अपने कलात्मक सफर में नाना पाटेकर ने यह साबित किया कि परदे पर प्रभाव छोड़ने के लिए भारी-भरकम सेटों की नहीं, बल्कि भीतर की ऊर्जा और सच्चाई की जरूरत होती है। उनकी खुरदरी, गूंजती हुई आवाज और आँखों की तीखी भाषा ने सिनेमाई अभिनय के व्याकरण को पूरी तरह बदल दिया था।

रंगमंच से अपने करियर की शुरुआत करने वाले पाटेकर ने सादगी भरे नाटकों से होते हुए फिल्मों का रुख किया। नब्बे के दशक में उन्होंने मुख्य धारा और समानांतर सिनेमा के बीच की लकीर को धुंधला कर दिया। क्राइम थ्रिलर ‘परिंदा’ में अस्थमा से पीड़ित एक सनकी और खूंखार खलनायक की उनकी भूमिका ने हिंदी सिनेमा में खलनायक की परिभाषा ही बदल दी, जिसके लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता का पहला राष्ट्रीय पुरस्कार मिला।

इसके बाद आया उनकी कला का वह दौर जिसने भारतीय समाज के गुस्से और हक की लड़ाई को परदे पर जीवंत कर दिया। चाहे वह सेना की पृष्ठभूमि पर बनी उनकी निर्देशित फिल्म ‘प्रहार’ हो, या फिर फिल्म ‘क्रांतिवीर’ में अन्याय के खिलाफ गरजने वाला ‘प्रताप तिलक’—उनके संवाद आज भी लोगों की जुबान पर हैं। ‘क्रांतिवीर’ के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के राष्ट्रीय पुरस्कार से नवाजा गया। गंभीर और फौलादी किरदारों के अलावा, ‘वेलकम’ जैसी फिल्मों में डॉन ‘उदय शेट्टी’ की उनकी कॉमिक टाइमिंग ने यह दिखा दिया कि वे हर विधा में कितने सहज थे। मराठी सिनेमा में ‘नटसम्राट’ जैसी फिल्मों के जरिए उन्होंने वृद्ध और उपेक्षित कलाकारों के दर्द को जिस शिद्दत से परदे पर उतारा, उसने दर्शकों को भीतर तक झकझोर कर रख दिया।

परदे के नायक से लेकर जमीन के मसीहा तक

अभिनय की दुनिया की चकाचौंध और स्टारडम से कोसों दूर, नाना पाटेकर की असल पहचान उनकी सादगी और इंसानी दर्द के प्रति उनकी संवेदनशीलता में बसती थी। वे सिनेमा की दुनिया से बाहर पुणे के पास एक शांत फार्महाउस पर बेहद साधारण जीवन व्यतीत करते थे।

जब महाराष्ट्र के मराठवाडा और अन्य ग्रामीण इलाकों में सूखे की मार के कारण किसानों की आत्महत्याओं का सिलसिला बढ़ा, तो यह अभिनेता चुप नहीं बैठ सका। उन्होंने अपनी कला से मिलने वाली प्रतिष्ठा और ऊर्जा को समाज के इस सबसे बड़े दर्द को पाटने में लगा दिया। साथी कलाकार मकरंद अनासपुरे के साथ मिलकर उन्होंने ‘नाम फाउंडेशन’ की स्थापना की। इस संगठन के जरिए उन्होंने न केवल सूखाग्रस्त क्षेत्रों के किसानों के परिवारों और विधवाओं को आर्थिक संबल दिया, बल्कि उनके बच्चों की शिक्षा और जीवन-यापन की जिम्मेदारी भी अपने कंधों पर उठाई। उनकी यह सामाजिक प्रतिबद्धता दिखाती थी कि वे केवल परदे पर ही नहीं, बल्कि असल जीवन में भी एक सच्चे ‘क्रांतिवीर’ थे।

शोक में डूबा फिल्म जगत

उनके निधन की खबर मिलते ही सिनेमा और राजनीति जगत से श्रद्धांजलि देने वालों का तांता लग गया। देश के प्रधानमंत्री से लेकर सिनेमा के तमाम दिग्गजों—अक्षय कुमार, रज़ा मुराद, राजपाल यादव, आर. माधवन और अन्य कलाकारों ने अपने गहरे शोक व्यक्त किए हैं। सभी का मानना है कि नाना पाटेकर का जाना भारतीय कला जगत में एक ऐसा खालीपन छोड़ गया है जिसे कभी भरा नहीं जा सकता।

नाना पाटेकर ने हमेशा अपनी शर्तों पर जीवन बिताया—पूरी तरह बेखौफ, पारदर्शी और मानवीय सरोकारों से जुड़े हुए। उनका भौतिक शरीर भले ही अब हमारे बीच नहीं रहा, लेकिन उनकी कला की गूंज और उनके द्वारा बोए गए सेवा के बीज हमेशा जीवित रहेंगे।

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